।। एक आवाज देश अन्नदाता के हक़ की ।।
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| KISAAN : AAJ BHI BDHAAL HAI |
किसान, किसान का हित और उसका भविष्य बस सिर्फ चुनावी जुमलों, टेलीविजन विज्ञापनों और अखबारों तक ही सिमट कर रह गया है। दोस्तों हो सकता है आपको सुनकर थोड़ा अजीब सा लगे पर ये सच्चाई है कि अगर किसानो के प्रति सरकारों का यही रुख रहा तो कृषि प्रधान भारत की आने वाली युवा पीढ़ी किसानो को बस फिल्मो और प्रेमचंद्र जी की कहानियों में ही देख पाएगी।
आज़ादी
हमे नसीब तो हुई पर हमारे समाज के तमाम कुनबे आज भी गुलामी की जंजीरों में
जकड़े हुए हैं, वास्तव में अगर चिंतन किया जाये तो हालात आज भी वही है इन
तबकों की जो अंग्रेजी सरकार में हुआ करती थी । हमारे समाज का कृषक समुदाय
भी इस बात का अपवाद नही है।
आज भी हम -
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दुःख भाग भवेत् ।।
को
हासिल नही कर पाए हैं । ये कल्पना का मन्त्र तभी प्राप्त किया जा सकता
है जब देश के किसानों को सरकारी योजनायों का अप्रत्यक्ष लाभ की तुलना में प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाया जाये और शायद तभी देश के अन्नदाताओं की
स्थिती में सुधार भी लाया जा सकता है।
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| MODI GOVT. POLICY FOR FARMERS |
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| MODI GOVT. POLICY FOR FARMERS |
सरकार किसानो के लिए अपनी योजनाओं के पुलिंदे बांधते बांधते भले ही न थकती हो, पर देखने की जरूरत ये है कि क्या वो योजनाएं वास्तव में पात्र किसानो तक पहुँच पाती हैं या सिर्फ अख़बार के पन्नो और टीवी के विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाती हैं।
असल में सोचने की जरूरत है हमारे
देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाने वाले ये अन्नदाता आज भी क्यों
उसी हाल में बने हुए है जैसी इनकी दशा मुग़ल शासन और अंग्रेजी हुकूमत में
हुआ करती थी,यह एक गहन अध्ययन और चिंतन का विषय भी है । इसके पीछे शायद जिम्मेदार है हमारी व्यवस्था और सरकार द्वारा प्रदत्त सेवाओं का लाभ सीधे किसानों के हाथों में न पहुंचना।
चलिये !
अब असल मुद्दे पर आते हैं..................................................................................................... आज के दौर में देखा जाये तो सरकारों के विकास का
केंद्र बिंदु कहीं न कहीं कल-कारखानों और उधोग धंधों तक ही सीमित सा नज़र
आता है । हाँ इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि हर सरकार किसानों के लिए
भी बड़ी बड़ी घोषणाएं करती हैं और योजनाएं भी लाती है पर देखने के लिये
दिलचस्प है कि क्या वो योजनाएं वास्तव में उस किसान तबके के हाथों तक
मुहैया हो पाती हैं या नही। आज जब भारत गुलामी की
जंजीरों को तोड़ कर उस स्थिति में है की विश्व की अर्थव्यवस्था में एक अहम
भूमिका निभा रहा है और एक विकासशील राष्ट्रों की श्रेणी में भी है उस दशा
में भी आज एक सामान्य कृषक परिवार मोहताज होता है आधुनिक सुख सुविधाओं से
अगर उसके पास कृषि के अलावा अर्जन के कोई अन्य माध्यम नही हैं तो ।
क्या
ऐसी परिस्थितियां सोचने पर विवश नही कर देती की क्यों एक किसान आत्महत्या
करने पर मजबूर हो जाता है और एक उद्योगपति करोड़ो लेकर विदेश रवाना हो जाता
है।
इन सब की क्या इकलौती वहज ये नही की ये किसान
तबका आज भी सरकार के विकासी विगुल की ध्वनि से दूर है ? और भी किसान गुलाम
है इन उद्योगपतियों का क्योंकि फसल और उपज इनकी होगी पर मूल्य निर्धारण
करेगा उद्योगपति क्यूंकि सरकार भी उसी के इशारों पर ही नाचने को मजबूर है। ऐसे में अगर कभी किसान अपने
फसलों के उचित दाम और सरकार से अपने हितों को पाने के लिए अगर मांग उठाता है तो उसे सरकार के दमनकारी
नीतियों का कठोर सामना करना पड़ता है, और सरकार येन केन प्रकारेण किसानो की उठती आवाज को दबा देती है । इस बात का ताजा उदाहरण है अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के मंदसौर में, अपनी
फसल के उचित दाम को लेकर लड़ रहे निर्मम किसानो पर, सरकार द्वारा कराई गयी
गोलीबारी..........
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| POLICE FIRING ON FARMER'S IN MANDSAUR MADHYA PRADESH (6 JUNE 2017) |
आखिर मध्यप्रदेश में मंदसौर के किसान अपनी फसलों के दाम और सरकार से अपने हितों को को लेकर ही तो आवाज उठा रहे थे, और हुआ क्या ???
सरकार
द्वारा पुलिस से फायरिंग करवाई गई जिसमें 5 किसानों की मौत हो गई , और
किसानों की उठती हुई मांगो को इस कदर दबा दिया गया कि शायद ही कोई किसान
फिर से अपनी फसलों के उचित दाम और अपने हितों की लड़ाई के लिए आवाज उठा सके और पूंजीपतियों द्वारा
हो रहे किसानों पर अत्याचार का विरोध कर सके ........
किसान विवश है क्योंकि उपज उसकी जरूर है पर मूल्य निर्धारण वो लोग करते हैं
जिनको शायद इस बात का भी अनुमान नही की फसल को तैयार करने में कितनी लागत
और कितना खून पसीना खर्च हुआ है और इस फसल से मिलने वाली राशि पर कितनो का
भविष्य टिका हुआ है।
हमारे
देश की आबादी के 50 प्रतिशत (या लगभग 60% से 70% कहें तो भी गलत नहीं होगा) लोगों की आजीविका आज भी कृषि पर निर्भर है पर
आज भी सरकार सार्वजानिक धन का सिर्फ 4 फीसदी ही कृषि क्षेत्र में निवेश
करती है। इस प्रकार कृषि क्षेत्र को न तो सरकारी नीतियों में प्राथमिकता है
और न ही बजट में, और शायद सरकार की इसी उदासीनता से जुड़ा हुआ एक मुद्दा यह
भी है कि पिछले दो दशकों में देश के तीन लाख से भी ज्यादा किसान आत्महत्या
कर चुके हैं। NATIONAL CRIME RECORD BUREAU (NCRB) की रिपोर्ट के मुताबिक आंकड़े कुछ इस प्रकार हैं -
वर्ष - 2014 में 5,650 किसान ने
वर्ष - 2015 में 8,007 किसानो ने
जबकि वर्ष 2016 में खाली महाराष्ट्र में तीन हज़ार से ज़्यादा किसानो ने आत्महत्या की।
जबकि वर्ष 2016 में खाली महाराष्ट्र में तीन हज़ार से ज़्यादा किसानो ने आत्महत्या की।
दोस्तों ! Oxfam (an international confederation
of charitable organizations focused on the alleviation of global
poverty) का एक अध्ययन है जिसके अनुसार भारत के 1 प्रतिशत लोगों के पास देश
की 50 प्रतिशत से भी ज्यादा सम्पत्ति है । शायद इस
अध्ययन में कोई हैरत वाली बात नहीं है , हम स्पष्ट देख सकते हैं कि आज भी
देश की सारी नीतियां और संसाधन सिर्फ कुछ गिने चुने परिवारों और तबको के
हाथों का खेल हैं।
हाँ कृषि के विकास हेतु सरकरों ने
समय- समय पर तमाम योजनायें शुरू की पर वो योजनाएं असल में सिर्फ कागजों पर
बहुत अच्छी लगती हैं,लेकिन जमीन पर उस तरह से नहीं दिखतीं न ही उन लक्ष्यों
को हासिल कर पाती हैं जिसके प्रतिपूर्ति के लिए सरकार ऐसी योजनाएं लागू
करती हैं। लिहाजा ये कहने में कोई आपत्ति नही होनी
चाहिए की सरकारी योजनाएं कागजों पर तो बहुत अच्छी दिखती हैं लेकिन ज़मीन पर
अप्रभावकारी बन कर रह जाती हैं।
भारत सरकार ने
Digital India की पहल की जिसका उद्देश्य था कि सभी नागरिकों तक सरकारी
सुविधाओं को बिना किसी भेद-भाव के पहुँचाया जा सके, पर हाल ही में CES
(Centre for Equity Studies) ने India exclusion report 2016 में तमाम ऐसे लोगों का ज़िक्र किया, जो Digital माध्यम से दी जा रही
सुविधाओं से भी वंचित हैं। इस तरह से कहा जा सकता है कि सरकार की सभी
सेवाएं और योजनाएं ऑनलाइन तो हुईं, लेकिन गरीब किसान और पिछड़े तबके अभी भी
ठीक से ऑनलाइन से नहीं जुड़ सके हैं।
हमारे अन्नदाता
आत्महत्या करने को मजबूर न हों इसके लिए आज इस किसान शब्द से जुड़े और नाता
रखने वाले हर शिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिए की वो अपने समुदाय के
लिए सवाल उठाएं कि ऐसा क्यों होता है कि कृषि व्यवसाय से जुड़े लोग ही अक्सर
सेवाओं और अधिकारों से वंचित रह जाते हैं? ऐसा क्यों होता है कि सरकार
विभिन्न योजनाओं के तहत नागरिकों को जो सुविधाएं देती है , वे ऊपर बैठे कुछ
सुविधा-सम्पन्न लोगों तक ही सिमट जाती हैं?
शिक्षा
विकास और रोजगार की दृष्टि से अगर देखा जाये तो आज भी भारत का किसान तबका
संसाधनों और सरकारी नीतियों से कोशों दूर है , लिहाजा सरकार की
सारी सेवाओं और सुविधावाओं का उपभोग भी वही करते है जो बड़े और विकसित किसान हैं और गरीब किसानों की हालत जस की तस बनी रहती है ।इसलिए योजना लाने से ज्यादा जरुरी है कि योजना हर पात्र व्यक्ति के हाथों में पहुंचे न की इन सामंतशाहिओं तक ही सिमट कर रह जाए । समता
का अधिकार सभी की जरूरत जरूर है पर आवश्यकता है पहले दबे कुचले और पिछड़े
लोगों को इन सामंतशाही परिवारों के साथ ला कर खड़ा किया जाये इसके लिए सबसे
पहले सरकार को सबसे पहले प्रत्येक पात्र व्यक्तियों के हाथों तक योजनायों का लाभ
सुनिश्चित करना होगा ।
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| ।।अन्नदाता सुखी भव।। |
इस
सच्चाई को नकारा नही जा सकता कि जब देश की अर्थव्यवस्था में 60 फीसदी
भूमिका निभाने वाला ये अन्नदाता सुखी होगा शायद तभी एक सुखद राष्ट्र की
कल्पना सकार हो सकती है ।
और सम्भवता तभी ।।अन्नदाता सुखी भव ।। का मन्त्र भी सार्थक होगा ।
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लेखक
ABHISHEK KUMAR MISHRA
LL.B HONS. (P.)
UNIVERSITY OF LUCKNOW
Gen. Secratary SATYA LEGAL UPDATES
प्रदेश संगठन मंत्री
डॉ कलाम शिक्षा एवं सेवा संस्थान उत्तर प्रदेश
Mob. +91-9918233378
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2. aksatya10081196@reddifmail.com
follow on twitter : @aksatya10081991
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