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किसानों की लहलहाती फसलों के संहारक बन कर खुलेआम बेख़ौफ़ घूम रहे योगी के सांड़ : Abhishek Mishra

प्राकृतिक संपदा संरक्षण और धर्मिक आस्था की आड़ में शेर एवं सांपों को घरों में नही पाल सकते-
Author :   Abhishek Mishra ; 28 January 2018  Lucknow
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सड़क के एक किनारे पर खड़ा होकर घण्टों तक सांडों के बीच घमासान जंग देखते हुए लगा मेरे लेखन हेतु खूंखार सांड जैसे विषय भी निःप्राय नही हो सकते।
बेघर बेरोजगार सांड़ों का धरना प्रदर्शन 

निःसंदेह गाय, बछड़े और सांड लोगों की धार्मिक आस्था का विषय हो सकते हैं, परन्तु उनकी आस्था उस वख्त देखते ही बनती है जब सड़क की घमासान सांड जंग की चपेट में अपने परिवार का कोई व्यक्ति लहूलुहान हो जाता है।

कृषिप्रधान देश होने के कारण प्रारम्भ में उस परिवार के लिए बेहद सुखद अनुभूति होती थी, जिसके घर की गाय बछड़ों को जन्म देती थी। क्योंकि दूध के साथ-साथ वह खेतों की जुताई बुवाई के लिए एक संसाधन भी उपलब्ध करा देती थी। शायद माता की संज्ञा के साथ एक पूजनीय स्थान देने की भी यही वजह रही होगी।
  
परन्तु वर्तमान में दुग्ध उत्पादन की होड़ ने गौवंश की ऐसी तमाम प्रजातियों को विकसित कर दिया, जिनके बछड़े कृषि कार्य हेतु पूर्णतया निर्रथक साबित हुए। साथ ही साथ खेती-बाड़ी हेतु अप्रत्याशित यांत्रिक संसाधनों (जैसे- ट्रैक्टर, रोटावेटर, थ्रेशर्स आदि) की उपलब्धता ने बैलों** की उपयोगिता को शून्य कर दिया।
आधुनिकीकरण के दौड़ में बैल सांडों में तब्दील हो गए और गांव, सड़क, गली-मोहल्लों पर उनकी भरमार हो गयी। बैल, जो कभी किसानों के अन्नदाता माने जाते थे  सांड बन कर अब लहलहाती फसलों के संहारक की भूमिका में आ गए। बड़े ढीलहेदार सांड जो कल तक ढुलाई और बतौर आवागमन के संसाधन उपयोग किये जाते थे, वो अब खुलेआम सड़कों पर गुंडागर्दी करने लगे। आपसी जंग से आम जनता के बीच भय पैदा करना और सांडों के आपसी जंग में दखल देने वाले पर जानलेवा हमले, सभ्य पूजनीय गौवंश का मुख्य पेशा सा बन गया। मतलब बेरोजगारी के दंश ने इन मेहनती कामकाजी बैलों को भी न बख्शा.........

खैर इतना सब कुछ बदल जाने के बाद भी दिलचस्प बात यह रही कि लोगों के दिलों दिमाग में सड़क के इन माफिया किस्म के सांडो की स्थिति सम्माननीय बनी रही। लोगों ने आसानी से इन दहशतगर्द सांडो को अपनी धार्मिक आस्था से भी जोड़ दिया। जिसका बाकायदा लाभ लिया गौरक्षा के नाम पर उभर कर आये तमाम संगठनों ने.............
जब बात संगठनों तक पहुंच ही गयी है तो एक वाकिया भी लगे हाथ बता ही दूं। यही कोई सन 2008-9 की बात होगी, उस वख्त मैं कक्षा 7 वीं में अध्यनरत था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने गौरक्षा हेतु एक कार्यक्रम चलाया था,जिसमें गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करवाने हेतु लोगों से सहयोग राशि एवं हस्ताक्षर एकत्र किए जा रहे थे। मैने भी कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था, अपनी उम्र और हैसियत के हिसाब से सहयोग राशि सहित कम से कम 200 हस्ताक्षर करवाये थे। परंतु वह कार्यक्रम भी शायद किसी दल विशेष का हथकंडा मात्र ही था और शायद सफल भी हो गया। 2017 उ0प्र0 विधानसभा चुनावों में प्रदेश में गाय और सांडों की हितैषी सरकार की ताजपोशी हो गयी।फिर न तो इन सांड और गायों के प्रबंधन की बात हुई और न ही इनको आवास अर्थात गौशाला मुहैया कराने की दिशा में कोई काम हुआ। सरकार बनने के बाद संघ (RSS) भी अपने "गौरक्षा संकल्प" को ठंडे बस्ते में डाल कर बैठ गयी।

सरकार की नीतियों में जगह न मिलने पर बेरोजगार-बेघर सांडों के पास सड़क पर धरना और अनशन के सिवाय अन्य कोई रास्ता नही बचा। धरना करते करते कभी बेचारे उग्र हो जाते हैं तो एक दो आम नागरिकों की जान भी चली जाती है, शायद वो इसी बहाने मतदाताओं पर गलत सरकार चुनने का गुस्सा उतार लेते हैं। 
इन साड़ों की जंग में उस बेचारे आम इंसान का क्या क़सूर, जो सड़कों पर दिन दहाड़े इनकी गिरफ्त में आकर जान जोखिम में डाल देता है। गाय वाली सरकार न तो इन साड़ों का प्रबंध कर रही, और न ही आम जनता को इन खूंखार सांडो से निपटने की कोई तरकीब सुझा रही।
अभी हाल ही कि घटना है दिल्ली में ठेले पर फल बेंचने वाला एक दुकानदार इन सांडो की जंग में मारा गया। दिल्ली High Court ने एक सराहनीय कदम उठाते हुए मृतक के पत्नी की याचिका को स्वीकार किया, सड़क पर घूम रहे सांडो को Delhi Municipal Corporation की जिम्मेदारी करार देते हुए निर्धारित किया कि इन सांडो का उचित प्रबंधन नगर निगम का दायित्व है। यदि वह ऐसा करने में विफल होता है और और किसी नागरिक को क्षति पहुंचती है तो नगर निगम द्वारा उस व्यक्ति के अनुच्छेद 21 ( Right to Life and Personal Liberty) का उल्लंघन माना जायेगा। इस मामले में उच्च न्यायलय ने मृतक के पत्नी को 10 लाख रुपये बतौर मुआवजा प्रदान करवाया। 
Shakuntala vs Govt Of Nct Of Delhi & Anr. on 1 July, 2009
काश कुछ ऐसा ही रुख इलाहाबाद उच्च न्यायलय भी अपनाता और सांडो की हिंसा हेतु उत्तर प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी तय करने में एक सार्थक शुरुवात की ओर अग्रसर होता।

यहां तक आ ही गये हैं तो चलिये इस समस्या पर थोड़ा संविधान निर्माताओं के रुख भी देख ही लेते हैं.....
संविधान सभा में मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति निर्देशक तत्वों पर बहस के दौरान पंडित ठाकुर दास जी द्वारा सदन के समक्ष दुधारू पशुओं की हिफाजत का मुद्दा भी नीति निर्देशक तत्वों के तहत शामिल करने को उठाया गया ताकि भविष्य की आने वाली सरकारें इस दिशा में कानून बनाकर दुधारू पशुओं के वध एवं खरीद फरोख्त को नियंत्रित कर सकें। इसी बात आगे बढ़ाते हुए सेठ गोविंददास जी ने दुधारू और गैर दुधारू दोनों तरह के पशुओं की हिफाजत को मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान करने तक की बात सदन के सामने रख दी।
संविधान सभा में विस्तृत बहस के उपरांत मुद्दे पर सबकी सहमति बनी और विषय को भाग 4 में नीति निर्देशक तत्वों के तहत संविधान के अनुच्छेद 48 में कुछ इस प्रकार से जगह मिली, "राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।"
Art. 48 of The Indian Constitution (Part IV, DPSP)
राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का तात्पर्य उन दिशा निर्देशों से था जिनके उल्लंघन पर कानूनी कार्यवाही का प्राविधान भले न हो, परन्तु वे आने वाली सरकारों को एक दायित्व जरूर सौंपते हैं। संविधान सभा का मानना था कि देश के मौजूदा संसाधनों के साथ उन उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति असम्भव थी, अतः इस जिम्मेदारी को लक्ष्य के तौर पर आने वाली सरकारों पर छोड़ दिया गया।

सरकारें आती जाती रहीं परन्तु न तो उन्हें उस नीति निर्देशक के उपबन्ध की चिंता हुई और न ही सड़क पर घूम रहे खूंखार सांडो की। गाय को मुद्दा बना कर सत्ता में आई सरकार ने भी सांड जंग में हुई मृत्यु/क्षति और खुले घूम रहे सांड़ो द्वारा लहलहाती फसलों की तबाही से आंख मूंद लिया। शायद सरकार गौशाला इत्यादि का निर्माण करा कर यदि इन बेघर सांडो को आवास मुहैया करा देती तो इनका अनशन प्रदर्शन समाप्त हो जाता, सड़कों पर लोग बेखौफ घूम सकते, किसान भी चैन की नींद ले सकता।
फसलों के विध्वंशीकरण में जुटे बेरोजगार-बेघर हो चले गौवंश (सांड़ बन्धु) 

धार्मिक आस्था के नाम पर सरकारें कब तक इन मुद्दों से मुह फेरती रहेंगी, लोगों ने तो शेर और सांपों से भी अपनी धार्मिक आस्था जोड़ रखा है, पूजते भी हैं। इसका ये मतलब कदापि नही की हम खूंखार शेरों और सांपों को अपने घरों में पाल लें। ऐसा ही कुछ रुख इख्तियार करते हुए सरकार को इन खूंखार सांड-बछड़ों की भी व्यवस्था करनी ही होगी, अन्यथा सरकार की "ऋण मोचन" योजना भी किसानों का दुःख मोचन नही कर सकती जब तक उसकी फसलों को इन आतातायी सांड़ों की नजरों से आबाद नही किया जायेगा।
                                                                       ● Abhishek Kumar Mishra      
                                                                         विधि विद्यार्थी (लखनऊ विश्वविद्यालय)
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