कालेज के दिन-हॉस्टल की बात फिर से दोस्तों के साथ : संस्मरण Memories : Which Passed In Lucknow
Author : Abhishek Mishra ; 10 June 2018 Lucknow
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| Irshad Ansari Naval Soni with me @BBD University Lucknow |
The Story of celebrations which we made every days with Ansari Bhai, a senior of me, with whom I shared my room for three years in Lucknow, while I was pursuing my law graduations. We were no blood relations but even more we were attached to each others, today I'm lackadaisical to seeing him off, after all attempts I failed to hide tears comming in my eyes.....
मन उदास है, कलेजा फफक-फफक कर रो रहा आंखों में आंसू तो जरूर हैं पर डर लग रहा कहीं छलक न जाएं। वजह कोई खास न होकर भी बहुत खास है, तीन वर्षों तक जिसके साथ रहा, जिसने हमेशा छोटे भाई सा स्नेह दिया Irshad Ansari भाई अपनी शिक्षायात्रा पूरी कर नए शहर की ओर रवाना हो रहे हैं।सोच रहा हूँ आखिर अब कौन मुझे सुबह सुबह जगाएगा, कौन मेरी गलतियों पर फटकार लगाएगा। दो चार दिन में तो मेरी अदात सुधरने से रही सो डर लग रहा मैं हर बार की तरह फिर से कमरे का दरवाजा खुला छोड़ दूंगा, पानी की टोटियां भी बन्द करना भूल जाऊंगा कौन हड़कायेगा मुझे, कौन समझायेगा मुझे।
समझ नही आ रहा अब मेरे गए गानों की दूसरी लाइनें कौन दुहरायेगा, मेरी बेसुरी राग में राग कौन मिलायेगा। किसे सुनाऊंगा मैं अपनी लिखी हुई गरमागरम शेरो-शायरियां, किसे बताऊंगा मैं अपने एकतरफा इश्क़ की कहानियां। भावनाएं अनियंत्रित हो बार बार हृदय को कचोट रहीं हैं पर अब इन्हें नियंत्रित कर हमे भी जिम्मेदार बनना होगा, बहुत कुछ जो आप बड़े भाई के तौर पर संभाल लेते थे अब हमे खुद करना होगा।
अंसारी भाई बनारस समीप चंदौली के रहने वाले थे और मैं गोण्डावासी, कहने का मतलब हम दोनों लोग शिक्षयात्रा के दौरान तकरीबन 400-500 किलोमीटर दूर से आ मिले। बोली भाषा में विषमतायें थीं पाठ्यक्रम भी अलग था, वो #MechanicalEngineering के छात्र थे और मैं कानून का विद्यार्थी परन्तु ये विषमतायें और दूरियां कभी हमारे बीच दीवार न बन पायीं।
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| Irshad Ansari Asim Siddiqui @DevaShareef Barabanki |
हमारा मजहब अलग था, त्यौहार अलग थे पर हमने साथ मिल कर मनाया और पूरे 3 वर्ष एक साथ गुजारे। त्यौहार किसी का भी क्यों न हो पर हम लोगों की खुशी हमेशा बराबर रहती थी, हमने ईद-दीवाली होली एक साथ बिताए। कभी मन्दिर जाना हो तब भी हम साथ होते थे, दरगाह जाना हो तब भी हम साथ होते थे। कभी कभी तो चौंक जाता था, मुझे टिके से थोड़ी चिढ़ थी पर अनगिनत बार मैंने अंसारी भाई को टिका-चंदन लगाए देखा है।
बात 2017 की है होली का त्यौहार था, किसी कारणवश मैं छुट्टियों में घर न जा सका। मुझे रंगों से थोड़ा डर लगता है, मसलन दोस्तों से थोड़ा कट के रहता हूँ कि कहीं कोई रंग न लगा दे पर अंसारी भाई को होली के रंगों से सराबोर देख मेरे मन से रंगों का डर खत्म हो गया, उस साल हम सबने मिलकर जबरदस्त होली खेली।
इतनी यादें-इतने संस्मरण हैं कि लिखने को पन्ने कम पड़ जाएंगे, पर हां 3-4 सालों में मैं जितना समझ पाया सिर्फ इतना ही कहूंगा यदि हर मुसलमान आप जैसा हो जाये तो हमारे मुल्क में अमन-चैन का तसुव्वर मुल्क की सूरत बदल देगा। आपने बतौर Senior जो इन्सानियत का पाठ पढ़ाया मेरे लिए आजन्म अविस्मरणीय रहेगा।
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#संस्मरण : #AbhishekMishra
#संस्मरण : #AbhishekMishra
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| Last Dinner With Ansari Bhai @BBD Luckno |





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