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रक्षा बंधन की शाम बहनों के नाम - संस्मरण : Abhishek Mishra

रक्षा बंधन की शाम बहनों के नाम - संस्मरण : Abhishek Mishra
Author :   Abhishek Mishra ; Lucknow 26 August 2018  
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Collection of my Raksha Bandhans
       **भाई-बहन के अप्रतिम प्यार का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व हर वर्ष सावन के मासांत में एक डोर के साथ भाई की कलाई पर अनगिनत अपेक्षायें बांध जाता है। ईश्वर की रहनुमाई ने मुझे भी दो बहनों से नवाज कर ख़ुशक़िस्मत बना दिया, सो परम्परा अनुसार मेरी भी दिली ख़्वाहिश रहती है कि रक्षा बंधन के विशेष पर्व में बहनों के साथ सरीक होकर उनकी ख़ुशी को बरकार रखें। हर वर्ष की भांति इस बार भी घर जाने की तैयारी में था परन्तु कुछ आर्थिक समस्याओं ने मेरा पांव पकड़ लिया। मुझे बाखूबी मालूम है कि गांव में सबके भाइयों को घर पर देख मेरी बहनें मेरी ग़ैर हाजिरी पर दुबक कर किसी कोने में जरूर रोयेंगी। इस बात की मुझे बेहद ग्लानि है कि उनका प्यार मेरी लाचारी को धिक्करता रहेगा।

मेरी बहनों ने मेरी कलाई पर अपने प्यार की डोर बांधते हुए कभी भी कोई बड़ी मांग न रखी, अपने सामर्थ्य अनुसार मैने जो भी दो चार रुपये उनकी हथेली पर रख दिया, वे उसी में खुश नज़र आयीं। रक्षाबंधन के बाद हमेशा ये बोलकर कि, "अभी हमार भाई एकौ पैसा कमात थोरै है" उन्होंने ताने मारने वाली आस पड़ोस की बहनों से मेरा बचाव किया। हंसी ठिठोली के बीच पूरी निर्लज्जता से हाथ में 2 रूपये का सिक्का लेकर राखी बंधवाते वख्त मैने हमेशा अपनी बहनों के चेहरे से उनकी अपेक्षाएं पढ़ने की कोशिश की, हर बार मन ही मन उनकी हर अपेक्षाओं को पूरी कर उनके भविष्य को खुशियों से भर देने का दृढ़ संकल्प लिया।

मध्यम वर्गीय कृषक परिवार से होने के नाते मेरी बहनों ने तमाम भेदभाव झेले। मैं जिस स्कूल में पढ़ा वो उनके लिए ठीक उसी तरह सपना रहा जैसा कि हमूमन Middle Claas Families में होता है। कई बार परिवार वालों से     विरोध भी किया, परन्तु पापा का जवाब " जब कमाय लगेव तब जस मन करी किहव" सुन एवं परिवार की आर्थिक दशा देख मैं आज भी स्तब्ध हो जाता हूँ और मन ही मन रक्षा बंधन पर लिए गए आपने संकल्प को दोहराने लगता हूँ। मेरी मंझली बहन के डॉक्टर बनने की चाहत हमेशा मेरे आलस्य को झकझोर कर कहती है, उसका ये सपना मुझे आपने बलबूते साकार करवाना है।

मेरी पढ़ाई में व्यवधान न आने पाए इसलिए मेरी बहनों को जितना मिला वो उसी में खुश रहीं, कभी पापा के आगे जिद पर अड़कर कुछ नहीं मांगा। परन्तु मेरे चेहरे पर चिंता की लकीरें देख या मेरी दबी आवाज सुन आज भी घर में अनशन करके पापा को मेरे खाते में पैसा भेजने पर विवश कर देती हैं। मेरी बहनों ने मेरी पढ़ाई एवं मेरे उज्वल भविष्य के लिए जो त्याग-तपस्या किया है, उनका बड़ा एवं एकलौता भाई होने के नाते सदैव मेरे नतमस्तक को जिम्मेदारियों से उऋण नही होने देगा।

सच पूछिए राखियों के हर धागों संग पिरोई हुई बहनों की अनन्त अपेक्षायें एवं उनमें गूंथा हुआ असीम प्यार इन मामूली राखियों से कहीं बहुत ज्यादा अहम हैं, और इन सब से भी ज्यादा अहम है भाईयों द्वारा हर क्षण अपना कर्तव्य बोध एवं बहनों के प्रति जिम्मेदारियों का संकल्प।

मेरे संस्मरणों की कड़ी जारी रहेगी, ख़ैर! इस अवसर विशेष पर आपके ध्यानाकर्षण हेतु बताते चलूं समाज की दोहरी मानसिकता ने सदैव पुत्रियों को पुत्रों जैसी सुख सुविधाओं से वंचित रखा है, हालांकि वर्तमान परिवेश में अपवाद के तौर पर थोड़े बहुत सुधार की झलक देखी जा सकती है परन्तु बहुलता आज भी जस की तस बनी हुई है। सो हम भाइयों को आज अपने ही परिवार में इस भेदभाव के खिलाफ बहनों का आवाज बनने की जरूरत है, शायद रक्षाबंधन पर बहनों को इससे अप्रतिम अन्य कोई उपहार न होगा।

Abhishek Mishra
LL.B Hons.(P.),
Lucknow University
#Yours'Commemt  @aksatya100

Comments

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद भाई, यह आपर ऊर्जा प्रदान करने के लिए

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  4. हृदय स्पर्शी, जबरदस्त व्याकरण

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  5. हृदय स्पर्शी, जबरदस्त व्याकरण

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    1. आपका स्नेह एवं आशीर्वाद इसी भांति सदैव बना रहे🙏

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  6. सजीव चित्रण किया है आपने
    अगर मैं ये कहूँ कि ये पढ़ के मुझे लगा कि मैं किसी आईने के सामने हूँ तो शायद गलत होगा बल्कि ये सिर्फ मेरे ही नहीं, समाज के एक बड़े हिस्से को प्रतिरूपित करता हुआ लेखन है।
    इसे पढ़ के जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।
    धन्यवाद।

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    1. इस आपर ऊर्जा एवं मनोबल को पाकर अन्तः करण गदगद हो गया ....🙏🙏🙏

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  7. एक बात बहुत अच्छी लगी कि हमे उन बहनो का आवाज बनना चाहिए और उनके साथ सदैव खड़ा रहना चाहिए....
    ...
    आप ने तो भाव विभोर कर दिया....
    अत्यन्त सुन्दर

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    1. बहुत बहुत आभार आपका विजय भैया की आपने मेरी आग्रह स्वीकार कर इस लेख को पढा, और हमे मनोबल प्रदान किया।

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