Skip to main content

स्वच्छता और हम ¡........... : Abhishek Mishra "Satya"

Mahatma Gandhi
"Sanitation is more important than independence".
Author :   Abhishek Mishra ; Lucknow 26 August 2018  
Follow on : Facebook | Twitter | Linkedin | What's app
   ●●तकरीबन डेढ़ हफ्तों से हमारे Kitchen में कूड़ों का ढेर लगता चला जा रहा है, एक पन्नी भर गयी तो दूसरी फिर तीसरी और ऐसे न जाने कितनी पन्नियों में मेरे साथ रह रहे दोस्तों ने भावी पीढ़ी की अमानत सहेज रखा है। पॉलिथीन की अनुपलब्धता पर खुले में कूड़ा रख देना या फिर मेरी नसीहत भरी झलल्लाहट को हंसकर झेल जाना, अब इनके स्वाभाविक धर्म में शामिल हो चुका है। इन महाबुद्धजीवियों  से कूड़ा फेंकने की विनती का मतलब है इनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा देना, और सलाह का सीधा मतलब है खुद को मूर्ख साबित कर लेना।

कूड़े की सड़न और दुर्गन्ध मुझसे बर्दाश्त तो नही होती, परन्तु "शठे शाठयम् समाचरेत्" का स्मरण कर अब हम भी पूरी तरह अभ्यस्त हो चुके हैं। एकाध हफ्ते की प्रतीक्षा के बाद जब किसी सज्जन की अंतरात्मा जागृत नही होती तो अंततः हार मानकर मैं अपनी नैतिकता पर उतर ही आता हूँ, कहने का मतलब हर बार वो दुर्गन्ध भरा कूड़ा मैं ही फेंकता हूँ।

    दरअसल महात्मा गांधी को गहनता से पढ़ने के बाद मैं समझ चुका हूँ कि जब तक किसी कार्य के प्रति आपके मन में हीन भावना (घृणा i.e. Inferiority Complex) बनी रहेगी तब तक, उस कार्य को करने की इच्छाशक्ति  , आप में पनप ही नही सकती। और बिना इच्छाशक्ति के कोई भी कार्य स्वेच्छया किया जाना पूरी तरह असम्भव है। निश्चित तौर पर ऐसी ही कोई हीन भावना हमारे उन मित्रों के मन में बसी है, जो अपने परिवेश की साफ-सफाई/कचरा फेंकना इत्यादि हीन कार्य मानकर घर में कचरों का ढेर लगाए जा रहे हैं।

कूड़ा-कचरा उठाने को लेकर लोगों के मन में बसी इसी हीन भावना को बाहर निकालने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वयं घर घर जाकर लोगों के शौचालय साफ किये, लोगों को स्वच्छता हेतु प्रेरित किया।  "मतलब हम कूड़ा-करकट उठाएंगे.......?" लोगों के ज़ेहन में बसी शायद इसी हीनता को समाप्त करने के लिए सवा सौ करोड़ आबादी के मुखिया, प्रधानमंन्त्री नरेंद्र मोदी जी ने 2 अक्टूबर 2014 को झाड़ू उठा लिया, देश भर में स्वच्छ भारत अभियान चलाया गया और गांधी के स्वप्न को साकार करने की पुरजोर कोशिश हुई।
"Swachh Bharat Abhiyan (SBA) or Swachh Bharat Mission (SBM) is a nation-wide campaign launched by Hon'ble Prime Minister Narendra Modi, which aims to clean up the streets, roads and infrastructure of India's cities, towns, and rural areas."

निः संदेह
स्वच्छ भारत अभियान कोई योजना नही अपितु एक प्रेरणा थी, जिसे हम सब आत्मसात कर अपने परिवेश को साफ सुथरा करने की जिम्मेदारी स्वीकार सकते थे। परन्तु अफ़सोस...! आरोप-प्रत्यारोप के परस्पर द्वंद में उलझ कर अपनी जिम्मेवारियों को भूल जाना, अब हम भारतवासियों की आनुवांशिकता में समा चुका है। बेशक, यही वजह है कि स्वच्छ भारत हम सब की चर्चाओं तक ही सिमट कर रह गया।

Abhishek Mishra
LL.B Hons.(P.),
Lucknow University
#Yours'Commemt  @aksatya100

Comments

Popular posts from this blog

रक्षा बंधन की शाम बहनों के नाम - संस्मरण : Abhishek Mishra

रक्षा बंधन की शाम बहनों के नाम - संस्मरण : Abhishek Mishra Author :   Abhishek Mishra ;   Lucknow 26  August 2018   Follow on :  Facebook   |  Twitter  |   Linkedin Collection of my Raksha Bandhans        **भाई-बहन के अप्रतिम प्यार का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व हर वर्ष सावन के मासांत में एक डोर के साथ भाई की कलाई पर अनगिनत अपेक्षायें बांध जाता है। ईश्वर की रहनुमाई ने मुझे भी दो बहनों से नवाज कर ख़ुशक़िस्मत बना दिया, सो परम्परा अनुसार मेरी भी दिली ख़्वाहिश रहती है कि रक्षा बंधन के विशेष पर्व में बहनों के साथ सरीक होकर उनकी ख़ुशी को बरकार रखें। हर वर्ष की भांति इस बार भी घर जाने की तैयारी में था परन्तु कुछ आर्थिक समस्याओं ने मेरा पांव पकड़ लिया। मुझे बाखूबी मालूम है कि गांव में सबके भाइयों को घर पर देख मेरी बहनें मेरी ग़ैर हाजिरी पर दुबक कर किसी कोने में जरूर रोयेंगी। इस बात की मुझे बेहद ग्लानि है कि उनका प्यार मेरी लाचारी को धिक्करता रहेगा। मेरी बहनों ने मेरी कलाई पर अपने प्यार की डोर बांधते हुए कभी भी कोई बड़...

Dr. B R Ambedkar (14 April 1891 - 6 December 1956) : संविधान निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के सपनों के भारत निर्माण में आज आपकी भागीदारी को समर्पित मेरा प्रयास

संविधान निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के सपनों के भारत निर्माण में आज आपकी भागीदारी को समर्पित मेरा प्रयास .....................                                Dr. B.R. Ambedkar (14 April 1891 - 6 December 1956) :  The father of mordern India           संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर जी के जन्मदिवस (14 अप्रैल ) पर समर्पित मेरा यह लेख उनके स्वर्णिम सपनों और लक्ष्यों के साथ भारत के समाजवादी पंथनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक गणराज्य (SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC) उद्देश्य की प्रतिपूर्ति हेतु प्रयास है। Preamble of the Indian Constitution भारतीय संविधान की प्रस्तावना         समाज में सेक्युलर विचार धारा के व्यक्तियों से कट्टरवादिता में अंधे हो चले स्वकथित बुद्धजीवी लोगों के अमर...

Abhishek Mishra "SATYA" (aksatya) : कुछ अपनी शेरों शायरी

1.      टूटे हुए इस दिल में थोड़ी आह रहने दो          तुम न सही पर किसी और कि , तो राह रहने दो          हां मालूम है तुम्हे मेरी शकल से नफरत है बहुत.......          पर दिल में तो थोड़ी मेरी चाह रहने दो...........।।                                         - @aksatya100                                         20 August 2017                                                  2. कभी खुशी से खुशी की तरफ नही देखा     तेरे बाद किसी और कि तरफ नही दे...

किसान : बस फिल्मों और प्रेमचंद्र जी की कहानियों में जिन्दा है......

                     ।। एक आवाज देश अन्नदाता के हक़ की ।। KISAAN : AAJ BHI BDHAAL HAI किसान, किसान का हित और उसका भविष्य बस सिर्फ चुनावी जुमलों, टेलीविजन विज्ञापनों और अखबारों तक ही सिमट कर रह गया है।  दोस्तों हो सकता है आपको सुनकर थोड़ा अजीब सा लगे पर ये सच्चाई है कि अगर किसानो के प्रति सरकारों का यही रुख रहा तो कृषि प्रधान भारत की आने वाली युवा पीढ़ी किसानो को बस फिल्मो और प्रेमचंद्र जी की कहानियों में ही देख पाएगी।                आज़ादी हमे नसीब तो हुई पर हमारे समाज के तमाम कुनबे आज भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए हैं, वास्तव में अगर चिंतन किया जाये तो हालात आज भी वही है इन तबकों की जो अंग्रेजी सरकार में हुआ करती थी । हमारे समाज का कृषक समुदाय भी इस बात का अपवाद नही है।  आज भी हम -                          ...

इक बार पुनः मैं टूट गया शायद सपने बुनते बुनते : Abhishek Mishra "Satya"

A uthor :   Abhishek Mishra ;   Lucknow 19 June 2 020 Follow on :  Facebook   |  Twitter  |   Linkedin  |  What's app इक बार पुनः मैं टूट गया शायद सपने बुनते बुनते, इक बार पुनः सब छूट गया, बस उम्मीदें चुनते चुनते, शायद मेरी बहु उम्मीदें ही इस टूटे दिल की दायी हैं मेरा बच्चों सा जिद्दीपन ही सब खोने में उत्तरदायी है।। मेरे टूटे इस दिल का बस तुम एक सहारा बन जाओ जलमग्न हुई मेरी आशाओं का एक किनारा बन जाओ, हमराह बनो इन सपनों का फिर से विश्वास जगा जाओ जीवित हूँ अबतक आशा में इक बार पुनः फिर आ जाओ।। धूमिल होती.... मेरी उम्मीदों में फिर पंख से लगाओ तुम, जो खोया है तुमको पाने में वो आत्मविश्वास जगाओ तुम। जीवन अभी बहुत लंबा यूं तन्हा चलना मुश्किल होगा...... पर तुमसा हमसफ़र मिला शायद तो फिर सबकुछ मुमकिन होगा।। सच पूछो तो रो रो कर भी शायद तुमको भुला नहीं पाया, बस ख्वाबों में तुमको देख देख.....शायद मैं अब तक जी पाया। खुद ही में खुद से रोया हूँ, खुद ही खुद को सुनते सुनते, इक बार पुनः मैं टूट गया शायद सपने ...